Sunday, 7 August 2011

दूर होकर तुझसे भी दूर हूँ कहाँ ?

दूर होकर तुझसे भी दूर हूँ कहाँ ?
तेरी यादों के दिए की लौ है जवां |

जहाँ कहीं प्रीत की छबी है दिख जाती
प्यार के रंगों में तेरी तस्वीर उभर आती
छबी में भी तू
तस्वीर में भी
तू मेरे पास है यहाँ

जब कभी मुस्कुराता हुआ बचपन है दिख जाता
उस बचपन में तेरा चहेरा है नज़र आता
मुस्कुराती हुई तू
खिलखिलाती हुई
तू मेरे पास है यहाँ

जब कभी पायल की मधुर जंकार है आती
सुने मन में मेरे हसीं महेफिल है सज जाती
जान है तू
और शान भी
तुझसे है महेफिल जवां

Saturday, 23 July 2011

दिदार-ए-यार

दिदार-ए-यार का नशा ऐसा है छाया
रात ढल गयी फिर भी होश न आया ||
लगता है ताउम्र रहेंगे इस नशे में हम
इस गली जाकर कोई नहीं है वापस आया ||

Thursday, 5 May 2011

|| सवाल - जवाब ||

एक दिन वो मुझसे पूछ बैठे के कभी मुझे भुल तो नहीं जाओगे तुम ?
अभी जैसे हमसाया बने फिरते हो क्या वैसे ही साथ निभाओगे तुम ?

खुलासा करते हुए में बोल बैठा के सांस लेना भी कैसे भुल जायेंगे हम ?
तुम तो इस जनम की बात करते हो और जन्मों जन्मो तक सतायेंगे हम !


Thursday, 31 March 2011

|| पहेली मुलाक़ात ||

तुमसे मिलके न जाने क्यूँ दिल में एक कसक सी उठी है |
चंद ही घंटो में मानो गुज़री ज़िन्दगी फिर से जी है ||

सोहम 'जांबाज़'
बड़ोदा
२८ फरवरी २०११

|| अधूरी आस ||

आज फिर तेरे शहर से हम तनहा हो के निकले |
मिलने की आस को दिल-ही-दिल में दबा के निकले ||

बड़ी आस थी के उनसे मुलाक़ात होती |
इसही बहाने बातें उनसे दो-चार होती |
मिलने की आस को दिल-ही-दिल में दबा के निकले ||
आज फिर तेरे शहर से हम तनहा हो के निकले ||

पहेले पता जो होता के उनसे मुलाक़ात न होती |
तो पूरी न होने वाली आस ही न की होती |
न मिलने के ग़म को दिल-ही-दिल में दबा के निकले ||
आज फिर तेरे शहर से हम तनहा हो के निकले ||

सोहम 'जांबाज़'
अबू धाबी - न्यू योर्क (हवाई उड़ान)
२१ मार्च २०११

|| एक अधूरी मुलाक़ात ||

दिन गुज़र चूका
रात ढल चुकी |
एक और मुलाक़ात
पूरी न हो सकी ||

कोशिश तो बहोत की के वो हमें हमराज़ बना लेते |
पर सारी कोशिशों के बाद भी वो रूबरू न हो सकी ||
एक और मुलाक़ात पूरी न हो सकी ||

कमोशी के परदे तले छुपी है उनकी रूह |
सारी मशक्कत के बाद भी वो बेपर्दा न हो सकी ||
एक और मुलाक़ात पूरी न हो सकी ||

सोहम 'जांबाज़'
पुणे
14 मार्च २०११

|| मुलाक़ात ||

उनसे जब पूछा मैंने के अब मिलोगे कब |
खामोश ही रहे वो तो कोई क्या समझे अब ?

पहेलियाँ बुझाना तो आता नहीं हमें या रब |
पर ये उन्हें कोई कैसे समझाए अब ?

शर्मीली हैं वो और नादान से हम हैं तब |
ऐसे में हम-उनको वो-हमें समाज पाएंगे कब ?

सोहम 'जांबाज़'
मांडवी - कच्छ
१० मार्च २०११