Saturday, 16 February 2008

Pyaar Ka Izhaar Kaise Karen...

पेशे खिदमत है .....

इरशाद ....

इज़हार--महोब्बत कैसे करूं, वो मेरे बस की बात नहीं |

इन्कार--महोब्बत जो हो गई, तो जीने की कोई आस नहीं ||


जब से देखा है वो चहेरा, वक़्त है जैसे थम सा गया !

उसे देखा करूं हर शाम सहर, उसके सीवा अब कोई काम नहीं ||


जब याद उसकी जाती है, बेबाक से हो जाते हैं हम |

ढूँढते रहेते हैं खुदको हरदम, अब उसके सीवा कोई पहेचान नहीं ||


कभी-कभी ज़हेन में आता है ख़याल, के कहेदु जाकर दिल की बात |

पर जाने क्यूँ रुक जाता हूँ, वरना 'ना' वो कहें ऐसे तो हालात नहीं ||


क्या होगा इस मसले का हल, कौन करेगा पहेली पहेल |

इसही उलझन में उलझा रहेता हूँ, वरना हल हो एसा ये सवाल नहीं ||


आखिर ही गई क़यामत की रात, और हो ही गया इजहार--गज़ब |

आखों ही आखों में गुफ्तगू हो गई, अब लब्जों का कोई इस्तेमाल नहीं ||


ये पूछो क्या मंज़र था क्या समां था क्या आरजू थी 'जांबाज़' |

कुछ कहे पाएंगे क्योंकि, अल्फजों में बयां हो सके एसा ये अहेसास नहीं ||


सोहम 'जांबाज़'- १२ - फरवरी - २००८

- लंदन -