Thursday, 31 March 2011

|| अधूरी आस ||

आज फिर तेरे शहर से हम तनहा हो के निकले |
मिलने की आस को दिल-ही-दिल में दबा के निकले ||

बड़ी आस थी के उनसे मुलाक़ात होती |
इसही बहाने बातें उनसे दो-चार होती |
मिलने की आस को दिल-ही-दिल में दबा के निकले ||
आज फिर तेरे शहर से हम तनहा हो के निकले ||

पहेले पता जो होता के उनसे मुलाक़ात न होती |
तो पूरी न होने वाली आस ही न की होती |
न मिलने के ग़म को दिल-ही-दिल में दबा के निकले ||
आज फिर तेरे शहर से हम तनहा हो के निकले ||

सोहम 'जांबाज़'
अबू धाबी - न्यू योर्क (हवाई उड़ान)
२१ मार्च २०११

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