Thursday, 27 November 2008
|| ज़िन्दगी ||
आज तो है पर कल शायद न हो कहीं
रहे जाए न कोई बात किसी से अनकही
क्या पता आज ज़िन्दगी का आखरी दिन तो नहीं
Sunday, 9 November 2008
क्या खोया क्या पाया मैंने ??? !!!
दिल का चैन गवाके !
क्या खोया क्या पाया मैंने ?
याद में आसूं बहाके !
क्या खोया क्या पाया मैंने ???
साथ में उसके जब रहेता था
खुशियों में खोया रहेता था
बिछड़ के उससे तनहा होके !!
क्या खोया क्या पाया मैंने ???
उसकी खनक से होता था सवेरा
उसके पहेलु में हो अँधेरा
दिन रैना का होश गवाके !!
क्या खोया क्या पाया मैंने ???
Sunday, 24 August 2008
इन्तेज़ार
तेरी आहट के इन्तेज़ार में |
एक ज़र्रा भी गर हिला है ,
तो करवट ली है बेकरार ने ||
शायद उन्हें तो अंदाज़ भी नहीं ,
के हम हैं किस तबियत-ऐ-हाल में ||
हम ही हैं जो जान लुटाये बैठे हैं ,
चश्मे-ऐ-कातिल के इस्तकबाल में ||
Thursday, 1 May 2008
|| तस्वीर ||
साथ बिताया था जो हसीन वक्त , वो दिलोदिमाग पे छा गया ||
and journey goes on...
Tuesday, 22 April 2008
Thursday, 27 March 2008
|| तेरे बिना ||
अधूरा है तेरे बिना |
चाँद भी खिला है इन्तेज़ार में,
पर आधा है तेरे बिना ||
तुम जो होते इधर तो, महेफिलें सज जाती |
चट्टानें भी लहेरती यहाँ, पर खामोश है तेरे बिना ||
तुम्हारा साथ पाकर तो, कलियाँ भी खिल जाती |
बहारें ही लहेरती यहाँ, पर पतझड़ है तेरे बिना ||
अब तो ये हालत है जांबाज़, के लोग भी कहने लगे हैं ये |
पहेले तो अच्छा भला था ये, पर पगला गया है तेरे बिना ||
तू कौन है, रहेती है कहाँ, पता जो मिल जाए तो आ जाऊँ वहां |
कब से ढूंढ रहा हूँ तुझको अकेला, क्योंकि अधूरा हूँ तेरे बिना ||
२२ मार्च २००८
Verzaska - Switzerland.
Saturday, 16 February 2008
Pyaar Ka Izhaar Kaise Karen...
पेशे खिदमत है .....
इरशाद ....
इज़हार-ए-महोब्बत कैसे करूं, वो मेरे बस की बात नहीं |
इन्कार-ए-महोब्बत जो हो गई, तो जीने की कोई आस नहीं ||
जब से देखा है वो चहेरा, वक़्त है जैसे थम सा गया !
उसे देखा करूं हर शाम सहर, उसके सीवा अब कोई काम नहीं ||
जब याद उसकी आ जाती है, बेबाक से हो जाते हैं हम |
ढूँढते रहेते हैं खुदको हरदम, अब उसके सीवा कोई पहेचान नहीं ||
कभी-कभी ज़हेन में आता है ख़याल, के कहेदु जाकर दिल की बात |
पर जाने क्यूँ रुक जाता हूँ, वरना 'ना' वो कहें ऐसे तो हालात नहीं ||
क्या होगा इस मसले का हल, कौन करेगा पहेली पहेल |
इसही उलझन में उलझा रहेता हूँ, वरना हल न हो एसा ये सवाल नहीं ||
आखिर आ ही गई क़यामत की रात, और हो ही गया इजहार-ऐ-गज़ब |
आखों ही आखों में गुफ्तगू हो गई, अब लब्जों का कोई इस्तेमाल नहीं ||
ये न पूछो क्या मंज़र था क्या समां था क्या आरजू थी 'जांबाज़' |
कुछ न कहे पाएंगे क्योंकि, अल्फजों में बयां हो सके एसा ये अहेसास नहीं ||
सोहम 'जांबाज़'- १२ - फरवरी - २००८
- लंदन -